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कश्मीरी कविता संग्रह “पनून दोद-पनैन दग” का राजस्थानी में “बरफ रै सै’र मांय” का हुआ लोकार्पण

अनुवाद कर्म में भाव प्रधान होना चाहिए: प्रोफेसर दीक्षित

अनुवाद मौलिक रचना में पर काया प्रवेश करने जैसा होता है : जोशी


बीकानेर । राजस्थानी विभाग, महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के तत्वावधान में सोमवार को कश्मीरी कविता संग्रह “पनून दोद-पनैन दग”
के राजस्थानी अनुवाद की पुस्तक ‘ बरफ रै सै’र मांय ‘ का लोकार्पण कुलपति सचिवालय परिसर में किया गया । लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मनोज दीक्षित ने की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार, कवि- कथाकार राजेन्द्र जोशी थे तथा कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि शिक्षाविद-साहित्यकार ओमप्रकाश सारस्वत रहे ।
कश्मीरी के वरिष्ठ साहित्यकार रफीक मसूद के कश्मीरी भाषा में लिखित कविता संग्रह का राजस्थानी भाषा में युवा साहित्यकार सुधा सारस्वत ने ‘बरफ रै सै’र मांय ‘ शीर्षक से अनुवाद किया जिसको सूर्य प्रकाशन मंदिर ने प्रकाशित किया है ।
प्रारंभ में राजस्थानी विभाग की सह प्रभारी डाॅ. संतोष शेखावत ने स्वागत भाषण करते हुए राजस्थानी विभाग की गतिविधियों को विस्तार से बताते हुए की विश्वविद्यालय का राजस्थानी विभाग निरंतर नवाचार करते हुए साहित्यकारों-पाठकों-शोधार्थियों से संवाद स्थापित करता रहा है।शेखावत ने कहा कि राजस्थानी विभाग का परिवार विश्वविद्यालय में बेहतरीन कार्य कर रहा है
लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रोफेसर मनोज दीक्षित ने कहा कि कश्मीरी कवित संग्रह का राजस्थानी भाषा में सुधा सारस्वत ने बेहतरीन अनुवाद किया है उन्होंने कहा कि “बरफ़ रै सै’र मांय” किताब की पृष्ठभूमि अपनी मातृभूमि कश्मीर के इर्द गिर्द घूमती है। जिसमें ख़ास तौर से समय के साथ कश्मीर में व्याप्त विषमताओं का,जड़ों से जुड़ाव और जीवन की सीढ़ियों में आने वाले अनपेक्षित बदलावों का मार्मिक चित्रण किया गया है।
प्रोफेसर दीक्षित ने कहा कि हिन्दुस्तान में विभिन्न भाषाएं बोली जाती है , अधिक भाषाऍं हमारी सांस्कृतिक धरोहर है उन्होंने कहा कि भाषाई यात्रा करते हुए हमें अनेक सांस्कृतिक अनुभव प्राप्त होते हैं, हमें अनुवाद में भाव को प्राथमिकता देनी चाहिए। दीक्षित ने कहा कि भारत की भाषाओं को जानने के लिए वहां की संस्कृति में रचना बसना पड़ता है तभी भावनात्मक अनुवाद किया जा सकता है। उन्होंने विश्वविद्यालय की छात्रा सुधा को बेहतरीन अनुवाद के लिए शुभकामनाएं दी।
मुख्य अतिथि कवि-कथाकार राजेन्द्र जोशी ने कहा कि अनुवाद मौलिक रचना में पर काया प्रवेश करने जैसा है, अनुवाद कर्म दोयम दर्जे का रचना-कर्म नहीं है।
जोशी ने कहा कि कश्मीरी कविताओं का राजस्थानी में अनुवाद संवेदनशीलता की गहराई के साथ सांस्कृतिक विविधताओं का परिचय देता है, युवा रचनाकार सुधा सारस्वत चीजों को सूक्ष्म तरीके से देखने वाली शोधार्थी है उन्होंने कहा कि कश्मीरी कविताओं का राजस्थानी भाषा के पाठकों के लिए सुधा सारस्वत का मुकम्मल प्रयास है।
राजेन्द्र जोशी ने कहा कि सुधा ने कश्मीरी भाषा के साहित्य को राजस्थानी भाषा में अनुवाद कर इसके माध्यम से कश्मीर में रहने वाले की असली तस्वीर को राजस्थानी भाषा के पाठकों से रूबरू करवाने का प्रयास किया है ।
विशिष्ट अतिथि ओमप्रकाश सारस्वत ने कहा कि कश्मीरी और राजस्थानी दोनों भाषाएँ अपने सांस्कृतिक,सामाजिक और ऐतिहासिक मूल्यों के दृष्टि से बेहद समृद्ध है।
इस अवसर पर अनुवादक सुधा सारस्वत नें अनुवाद प्रक्रिया को विस्तार से बताया। सुधा सारस्वत ने कीरत, सांकळ, भविसवेत्ता, मिनखा सौरभ, बेकार पांडुलिपि,बै दो आंख्यां सहित अनेक कविताओं का वाचन भी किया।
संयोजकीय व्यक्तव्य में शोधार्थी डाॅ. नमामी शंकर आचार्य ने कहा कि विश्वविद्यालय के छात्र शोधकार्य के साथ कला,साहित्य और संस्कृति के के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य कर रहे है
शोधार्थी अनु राजपुरोहित ने सुधा सारस्वत के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला ।
लोकार्पण समारोह में प्रोफेसर राजाराम चोयल ,डॉ.अनिल कुमार दुलार, डाॅ.प्रभुदान चारण,
हितेन्द्र मारू,डॉ.गौतम मेघवंशी,
रामावतार शर्मा,विनोद सारस्वत,मंजु सारस्वत,अनु राजपुरोहित,सोनाली छींपा,राजु नाथ,देव सारस्वत,शुभकरण उपाध्याय सहित अनेक लोग उपस्थित थे।

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