प्राचीन भारत की वैज्ञानिक विरासत आज भी मार्गदर्शक : प्रो. त्रिवेदी

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बीकानेर।महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के सूक्ष्मजीवविज्ञान विभाग द्वारा “प्राचीन भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा ज्ञान युग में उसकी प्रासंगिकता” विषय पर विस्तार व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पूर्व कुलपति एवं बीरबल साहनी पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. प्रवीण चाँद त्रिवेदी मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे।
अपने उद्बोधन में प्रो. त्रिवेदी ने कहा कि प्राचीन भारत का विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी अत्यंत व्यापक, गहन एवं प्रेरणादायक रहा है। उन्होंने बताया कि भारत की प्राचीन सभ्यता केवल आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भी उच्चतम मानक स्थापित किए। उन्होंने शून्य एवं दशमलव प्रणाली के आविष्कार, ग्रहों की गति की सटीक गणना तथा आयुर्वेद की वैज्ञानिक पद्धतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन भारतीय विज्ञान सैद्धांतिक होने के साथ-साथ व्यावहारिक जीवन से भी गहराई से जुड़ा हुआ था। उन्होंने प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा की वैज्ञानिकता तथा उसकी वर्तमान समय में प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
उन्होंने आगे कहा कि आज का युग ज्ञान-आधारित युग है, जहाँ सूचना, नवाचार और तकनीकी दक्षता विकास की आधारशिला हैं। ऐसे में आवश्यक है कि हम अपनी वैज्ञानिक विरासत का पुनर्मूल्यांकन करते हुए उसे आधुनिक अनुसंधान, शिक्षण एवं नवाचार से जोड़ें। उन्होंने विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को प्रेरित करते हुए प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय के माध्यम से नए शोध आयाम विकसित करने तथा समाजोन्मुख वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. अभिषेक वशिष्ठ ने अपने उद्बोधन में कहा कि वैदिक एवं उत्तरवैदिक काल से लेकर गुप्त काल तक विकसित वैज्ञानिक परंपरा में गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, धातुकर्म, वास्तुकला एवं जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई। उन्होंने कहा कि भारतीय विज्ञान की अवधारणाएँ—जैसे सतत विकास, पर्यावरणीय संतुलन, समग्र स्वास्थ्य तथा मानव-केंद्रित तकनीक—आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी अपने समय में थीं।
इस अवसर पर विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता प्रो. अनिल कुमार छंगाणी ने कहा कि भारत की प्राचीन वैज्ञानिक विरासत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान एवं भविष्य के लिए मार्गदर्शक ज्ञान-धारा है। उन्होंने कहा कि भारत की वैज्ञानिक परंपरा हमें सिखाती है कि ज्ञान का सर्वोत्तम उपयोग तभी है, जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।
कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. धर्मेश हरवानी द्वारा किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के शिक्षकगण—डॉ. प्रगति सोबती, डॉ. संतोष कंवर शेखावत, डॉ. प्रभुदान चारण, डॉ. लीला कौर, डॉ. ज्योति लखानी, डॉ. फौजा सिंह, श्री अमरेश सिंह—तथा अतिरिक्त कुलसचिव डॉ. बिट्ठल बिस्सा, डॉ. यशवंत गहलोत, डॉ. उमेश शर्मा सहित अतिथि संकाय सदस्य एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।

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