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Male मैटर्स- रणवीर सिंह की पैटरनिटी लीव का मजाक क्यों:पुरुष भी बदल सकते हैं बच्चे की नैपी, रोते बच्चे के साथ जाग सकते हैं पूरी रात

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Male मैटर्स- रणवीर सिंह की पैटरनिटी लीव का मजाक क्यों:पुरुष भी बदल सकते हैं बच्चे की नैपी, रोते बच्चे के साथ जाग सकते हैं पूरी रात

अभिनेता रणवीर सिंह फिल्मों से एक लंबा ब्रेक लेकर छुट्‌टी पर जा रहे हैं। इस सितंबर दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह के घर एक नया मेहमान आने वाला है। रणवीर ये वक्त अपनी पत्नी और होने वाले बच्चे की मां के साथ गुजारना चाहते हैं।

रणवीर की पैटरनिटी लीव की शुरुआत बच्चे के जन्म के साथ नहीं हुई है क्योंकि उसमें तो अभी पांच महीने बाकी हैं। यह वक्त उस स्त्री के निकट रहने, उसका ख्याल रखने, दिन-रात हर उतार-चढ़ाव में साथ रहने के लिए है। वह स्त्री, जिसके साथ पहले प्रेम और जीवन का और अब पैरेंटहुड का भी साझा है।

सोशल मीडिया पर इस खबर को लेकर रिएक्शन सिर्फ खुशी और मुबारकबाद का नहीं है। फेसबुक पर बहुत सारे लोग एक बार फिर रणवीर को कमजोर, नाकारा, आलसी और नामर्द जैसी उपमाओं से नवाज रहे हैं। उन्हें नहीं लगता कि एक पुरुष का प्रेग्नेंसी जैसे सुंदर, नाजुक और बेहद जरूरी समय में अपनी पत्नी के साथ होना कोई ऐसी बात है, जिसे सेलिब्रेट किया जाए।

और खासतौर पर अगर पुरुष सारे काम छोड़कर, जॉब से छुट्‌टी लेकर सिर्फ घर पर रहने और अपनी पत्नी का ख्याल रखने का फैसला करे तो यह कतई ऐसी बात तो नहीं है, जिसके लिए खुश हुआ जाए। उन्हें लगता है कि ऐसा करना प्रेम और ताकत की नहीं, मर्दाना कमजोरी की निशानी है। स्त्रैण पुरुष ही इस तरह के जनाना मसलों को लेकर भावुक होते और आंसू बहाते हैं। रणवीर पर्याप्त मर्द नहीं है।

ऐसा नहीं है कि हमारे समाज के पुुरुष पिता होने के प्रति कोई जिम्मेदारी महसूस नहीं करते। लेकिन सवाल ये है कि वो इस जिम्मेदारी को कैसे परिभाषित करते हैं। उनके मुताबिक पुरुष परिवार का मुखिया है और मुखिया का काम है पैसे कमाना, भरण-पोषण करना और रक्षा करना। हर वो चीज, जिसमें मांसपेशियों का बल हो, वह पुरुषोचित काम है। लेकिन रोते हुए बच्चे को चुप कराना, उसकी नैपी बदलना, बच्चे के साथ रात भर जागना, उसे सुलाना, खिलाना, दुलराना, ये सब पुरुष का काम नहीं है। ये जनाना काम है।

ऐसा भी नहीं है कि 100 फीसदी मर्द ऐसा ही सोचते हैं, लेकिन बहुसंख्यक तो ऐसे ही सोचते हैं। मैं अपने घर, गांव, शहर, मुहल्ले और आसपास ऐसे पुरुषों को देखते हुए बड़ी हुई हूं, जो आधी रात किसी नवजात बच्चे के रोने पर औरत को डांटकर कहते थे कि इसे चुप कराओ। औरत का ध्यान बच्चे को दुलारने और उसकी जरूरत पूरी करने से ज्यादा इस बात पर होता था कि कहीं आदमी गुस्सा न हो जाए। अभी भी हमारा देश बहुत बदला नहीं है।

वर्ष 2014 में स्वीडन में एक स्टडी हुई- प्रेग्नेंसी प्लानिंग स्टडी। इस स्टडी का मकसद ये समझना था कि प्रेग्नेंसी आमतौर पर विवाहित जोड़ों के जीवन को किस तरह बदलती है। बच्चा पैदा करने का फैसला कितना सोच-समझकर लिया जाता है और कितना यह बस हो जाता है। इस स्टडी के तमाम सवालों में एक सवाल ये था कि प्रेग्नेंसी और डिलिवरी जिस तरह एक औरत की पूरी दिनचर्या, रूटीन और जीवन को बदल देती है, वैसे ही क्या पुरुष के जीवन में भी बदलाव होता है।

इस सवाल के जवाब में 83 फीसदी पुरुषों का कहना था कि पत्नी की प्रेग्नेंसी और घर में नए बच्चे की आमद से उनकी जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया। 83 फीसदी पुरुषों ने अपने रूटीन, लाइफ-स्टाइल, कंफर्ट, आदतों और व्यवहार में कोई बदलाव नहीं किया ताकि वे घर की महिला के लिए उसकी बदली जिंदगी, नई जिम्मेदारियों और जरूरतों के बीच ज्यादा सपोर्टिव, ज्यादा मददगार हो सकें।

यह स्वीडन की कहानी है, जो जेंडर इक्वैलिटी इंडेक्स में भारत से बहुत ऊपर है। उस देश की 95 फीसदी से ज्यादा महिला आबादी नौकरीपेशा है और उन्हें सरकार की तरफ से लंबी मैटरनिटी लीव से लेकर चाइल्डकेयर तक हर तरह की सुविधा हासिल है। लेकिन इन सबके बावजूद एक स्त्री को घर के भीतर अपने पति और बच्चे के पिता से तो फिजिकल, मेंटल, इमोशनल सपोर्ट चाहिए, वो नहीं मिल रहा है। मां नवजात बच्चे के साथ रात-रात भर जाग रही है और पति अब भी अपने दोस्तों के साथ शाम पब में बिता रहा है। उसकी दिनचर्या में कोई खास बदलाव नहीं आया है। हालांकि मुमकिन है कि अब वो पहले से ज्यादा काम करने और पैसे कमाने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन वो इमोशनल सपोर्ट नहीं दे रहा।

इसके पीछे कारण क्या है। क्या पुरुष जेनेटिकली भावनाओं को उस गहराई तक जाकर महसूस कर सकने में अक्षम हैं या इसकी जड़ें उनकी पैट्रीआर्कल परवरिश में हैं। इसी सवाल का जवाब ढूंढ रहे थे इस्राइल की तेल अवीव यूनिवर्सिटी के डॉक्टर और वैज्ञानिक।

तेल अवीव यूनिवर्सिटी के स्‍कूल ऑफ मेडिसिन में हुई इस स्‍टडी ने पूरी दुनिया को चौंका दिया.

स्‍टडी का विषय ये था कि जब एक औरत प्रेग्नेंट होती है तो बतौर कपल पति और पत्नी दोनों के शरीर में क्या फिजियोलॉजिकल बदलाव होते हैं। जाहिर है, जिसने अपने शरीर में बच्चे को धारण किया है, उसका शरीर तो हॉर्मोन्स की रोलर-कोस्टर राइड से गुजर ही रहा होता है। उसके ब्रेन का हाइपोथैलेमस और एमिग्डला ज्यादा सक्रिय हो जाता है। यानी मष्तिष्क का वो हिस्सा, जो प्यार, भावनात्मक लगाव महसूस करता है। लेकिन क्या यही बदलाव पुरुष यानी बच्चे के पिता के मस्तिष्क में भी हो रहे होते हैं।

ये जानने के लिए डॉक्टरों ने प्रेग्नेंसी के दौरान और बच्चे के जन्म के छह महीने बाद तक 10 कपल्स की ब्रेन मैपिंग की। लगातार उनके हॉर्मोन्स और ब्रेन न्यूरॉन्स में हो रहे बदलावों को रिकॉर्ड करते रहे। स्टडी पूरी होने पर डॉक्टरों ने पाया कि प्रेग्नेंसी के दौरान तो महिला का हाइपोथैलेमस और एमिग्डला ज्यादा एक्टिव था, लेकिन बच्चे के जन्म के बाद स्त्री और पुरुष दोनों के एमिग्डला से रिलीज हो रहे ऑक्सीटोसिन हॉर्मोन की मात्रा समान थी। दोनों की न्यूरल एक्टिविटी एक जैसी थी। यानी प्यार, लगाव, जुड़ाव और रिश्ते की इंटेंसिटी को महसूस करने के लिए जो हॉर्मोन्स जिम्मेदार हैं, वो स्त्री और पुरुष दोनों के शरीर में समान रूप से रिलीज हो रहे थे।

इस स्टडी ने उन तमाम प्रचलित और पारंपरिक मान्यताओं को तोड़ दिया, जो यह दावा करती हैं कि औरत ज्यादा नरचरिंग होती है, ज्यादा प्यार करती है और पुरुष भावनात्मक रूप से प्यार को महसूस कर पाने और दे पाने में अक्षम हैं।

ये जो फर्क हमें अपने आसपास दिखाई देता है, वो फर्क बायलॉजी का, हॉर्मोन्स का नहीं है। वो फर्क है परवरिश का। लड़कों को जिस तरह से पाला जाता है, उनके ब्रेन के इमोशनल सेंटर ठीक से विकसित ही नहीं हो पाते। या होते भी हैं तो उनसे उम्मीद की जाती है कि वो हर वक्त सिर्फ ताकत और कठोरता का ही प्रदर्शन करें। वो अपनी कमजोरी, भावुकता, कोमलता और अपने दिल के नाजुक हिस्से को जाहिर ही न होने दें। सिर्फ एक ही इमोशनल एक्सप्रेशन स्वीकार्य है- क्रोध का। मर्द सिर्फ गुस्सा हो सकता है। नाजुक नहीं हो सकता, रो नहीं सकता।

ये तो प्रॉब्लम है न, वो बायलॉजिकल नहीं, सोशल है। समाज की बनाई हुई है, इसलिए ये सॉल्व भी की जा सकती है। इसे ठीक करने और लड़कों को ज्यादा संवेदनशील और समझदार इंसान बनाने का एक ही तरीका है कि लड़के-लड़कियों की परवरिश में कोई भेद न किया जाए। लड़कियों को भी साहसी होने का मौका मिले और लड़कों को भी कमजोर हो सकने का। लड़कों के रोने पर उन्हें लड़की कहकर चिढ़ाया न जाए।

अगर पुरुषों को ये बात समझ आ जाए कि पैट्रीआर्की ने सिर्फ औरतों का नहीं, उनका भी बहुत नुकसान किया है।

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