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ओम बिरला फिर बन सकते हैं लोकसभा अध्यक्ष:अनोखे रिकॉर्ड की बराबरी करेंगे; भाजपा अध्यक्ष का विकल्प भी खुला, सूत्रों के हिसाब से बन सकते है राजस्थान के सीएम पढ़े-उनसे जुड़ी 4 संभावनाएं

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ओम बिरला फिर बन सकते हैं लोकसभा अध्यक्ष:अनोखे रिकॉर्ड की बराबरी करेंगे; भाजपा अध्यक्ष का विकल्प भी खुला, पढ़ें-उनसे जुड़ी 4 संभावनाएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में पिछले कार्यकाल में लोकसभा अध्यक्ष रहे ओम बिरला को जगह नहीं दी गई है। माना जा रहा था कि स्पीकर का कार्यकाल पूरा करने के बाद बिरला को कैबिनेट में जगह मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं होने से अब उनके भविष्य को लेकर कई तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं। सूत्रों के मुताबिक बिरला के लिए बड़ी भूमिका वाले रास्ते अभी भी खुले हुए हैं।

बिरला के लिए अभी कौन-कौन सी संभावनाएं हैं, क्या वे दोबारा लोकसभा अध्यक्ष बन सकते हैं, पढ़िए इस रिपोर्ट में…

मोदी मंत्रिमंडल के गठन के बाद अब यह संभावना बनी है कि ओम बिरला एक बार फिर लोकसभा अध्यक्ष बनेंगे। बिरला मोदी और शाह के नजदीकी माने जाते हैं और स्पीकर के संवैधानिक पद पर रहते हुए उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए, जो अपने आप में रिकॉर्ड हैं।

अपनी कार्यशैली के कारण भाजपा सहित विरोधी दलों में भी उनकी अच्छी पैठ है। भाजपा इस बार पूर्ण बहुमत में नहीं है, इसलिए मोदी-शाह भी अपने विश्वासपात्र को ही लोकसभा अध्यक्ष बनाना चाहेंगे। इस चॉइस में भी बिरला खरे उतरते हैं।

हालांकि भाजपा का पूर्ण बहुमत में न आना ही उनके अध्यक्ष बनने में रोड़ा भी साबित हो सकता है, क्योंकि सहयोगी दल स्पीकर पद की मांग कर रहे हैं।

एक नया रिकॉर्ड बना सकते हैं बिरला
बिरला यदि दूसरी बार फिर लोकसभा अध्यक्ष बनाए जाते हैं और वे इस पद पर अपना दूसरा कार्यकाल भी पूरा कर लेते हैं, तो उनके नाम एक रिकॉर्ड और दर्ज हो सकता है। साढ़े तीन दशक पहले लगातार दो बार चुने जाने और कार्यकाल पूरा करने वाले बलराम जाखड़ एक मात्र लोकसभा अध्यक्ष रहे हैं। जीएम बालयोगी, पीए संगमा जैसे नेता दो बार लोकसभा अध्यक्ष तो बने, लेकिन पूरे 5-5 साल के कार्यकाल पूरे नहीं किए। बलराम जाखड़ ने साल 1980 से 1985 और 1985 से 1989 तक अपने दोनों कार्यकाल पूरे किए।

गठबंधन की मजबूरियों के कारण यदि लोकसभा अध्यक्ष का पद सहयोगी दलों के पास जाता है तो इस स्थिति में ओम बिरला का नाम राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए भी दौड़ में है। इस पद के लिए राजस्थान से ही भूपेंद्र यादव का नाम भी चला था, लेकिन उन्हें मंत्रिमंडल में जगह दे दी गई है। अब माना जा रहा है कि यदि बिरला लोकसभा अध्यक्ष नहीं बन सके, तो मोदी-शाह के नजदीकी होने के कारण उन्हें बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद दिया जा सकता है।

बीजेपी सूत्रों के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के संभावित नामों में बिरला का भी नाम है, लेकिन इस मामले में एक अड़चन भी है। यह कि महाराष्ट्र, बिहार, हरियाणा, दिल्ली जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। बीजेपी चुनावी फायदा लेने के लिए इन राज्यों में से किसी एक राज्य के नेता का नाम अध्यक्ष पद के लिए चुन सकती है।

हालांकि अब तक लोकसभा अध्यक्ष का कार्यकाल खत्म होने के तत्काल बाद पार्टी अध्यक्ष का पद किसी को नहीं दिया गया है।

राजस्थान में प्रदेश अध्यक्ष पद पर नए नाम को लेकर भी चर्चा तेज है। जब पिछले साल विधानसभा चुनाव जीतने के बाद बीजेपी ने भजनलाल शर्मा का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए घोषित किया था, तभी से प्रदेश अध्यक्ष बदलने की चर्चाएं शुरू हो गई थीं। कारण केवल एक ही है कि सीएम और प्रदेश अध्यक्ष दोनों ही ब्राह्मण हैं। वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी को इस पद पर एक वर्ष होने वाला है और वे दूसरी बार चित्तौड़गढ़ से सांसद बने हैं।

बिरला के प्रदेश अध्यक्ष बनने में भी एक अड़चन है। राजस्थान में जाट और राजपूत समाज एक बड़ा वोट बैंक है, जो वोटिंग के दौरान एक तरफा तौर पर एकजुट हो जाता है। इस लोकसभा चुनाव के दौरान प्रतिनिधित्व और टिकट कटने सहित अन्य कारणों के कारण जाट समाज बीजेपी से नाराज रहा। जाट समाज को साधने के लिए भागीरथ चौधरी को केंद्र में मंत्री बना दिया गया है।

इधर, राजपूत समाज के लिए कहा जा रहा है कि वह नाराजगी के कारण उतनी तादाद में वोट डालने के लिए निकला ही नहीं, जैसे पहले निकला करता था। इसका नुकसान बीजेपी को 11 सीट गंवा कर भुगतना पड़ा।

ऐसे में माना जा रहा है कि राजनीतिक फायदा उठाने के लिए बीजेपी जाट समाज या राजपूत समाज से प्रदेश अध्यक्ष चुन सकती है। बिरला वैश्य समाज से आते हैं। लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद कोई नेता पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष बना हाे, ऐसा भी कभी नहीं हुआ।

संगठन में जाते हैं तो माइक्रो मैनेजमेंट का मिल सकता है फायदा
बिरला की खासियतों में से एक है माइक्रो मैनेजमेंट, जो संगठन को फायदा पहुंचा सकती हैं। चाहे उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाए या प्रदेश अध्यक्ष। कई बार वे भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने माइक्रो मैनेजमेंट के फंडे समझाते भी आए हैं। कई बार पार्टी ने उनके लिए विशेष सत्र भी रखे हैं।

राजस्थान में फिलहाल नेतृत्व परिवर्तन की संभावना लगभग नगण्य है, लेकिन यदि ऐसा होता है तो ओम बिरला इस पद के लिए सबसे बड़े दावेदार होंगे। विधानसभा चुनाव के बाद भी इस पद के लिए उनका नाम तेजी से उछला था।

सख्ती भी दिखाई, बड़ी संख्या में सांसद किए निलंबित
संसद में पिछले साल 13 दिसंबर को युवाओं के अचानक घुसने से हंगामा मच गया था। इन युवाओं की घुसपैठ के चलते विपक्षी दलों ने लोकसभा की सुरक्षा में चूक के आरोप लगाए थे। बिरला का तर्क था कि इसे सुरक्षा में चूक नहीं माना जाए। खराब व्यवहार के कारण बिरला ने पूरे सत्र के लिए 13 विपक्षी सांसदों के निलंबन कर दिया था। उन्होंने कहा था कि इस कार्यवाही को 13 दिसंबर की घुसपैठ की घटना से जोड़कर नहीं देखा जाए।

बिरला की कर्मभूमि हमेशा कोटा ही रही है। बिरला का जन्म 23 नवंबर 1962 को हुआ। उनके पिता उस समय श्रीकृष्ण सरकारी सेवा में थे, वहीं मां शकुंतला घर संभालती थीं। उन्होंने स्कूली शिक्षा कोटा के गुमानपुरा राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय से की और उसके बाद बाद राजस्थान विश्वविद्यालय से बी.कॉम और एम.कॉम पूरी की। उनकी शादी अमिता से हुई और उनके दो बेटियां अंजली और आकांक्षा हैं। अमिता पेशे से सरकारी डॉक्टर हैं।

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